शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2020

कॉरॉना पर जलती पराली का असर ।

कोरॉना पर जलती पराली का असर
 
अन्नदाता किसानों पर हाल के कुछ वर्षों में पराली जलाकर पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने का आरोप लगने लगा है। कुछ हद तक यह सही भी है। पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार गत वर्ष 27 सितम्बर से 9 नवम्बर के बीच राज्य में पराली जलाने की कुल 39,973 घटनाएँ दर्ज की गई। इनमें से 22,313 घटनाएँ 1 से 9 नवम्बर के बीच सामने आई।

 कृषि एवं पर्यावरण क्षेत्र के विशेषज्ञों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि अगर इस बार किसानों को पराली जलाने से रोकने में सरकार फेल रही तो कोविड-19 महामारी की समस्या में बेतहाशा इजाफा हो सकता है।

रबी फसल की बुवाई के मौसम से पहले इस महीने के अंत तक पराली जलाने की प्रक्रिया शुरू होने की आशंका है। इस कारण कोरोना वायरस महामारी और भयावह रूप ले सकती है। एक कृषि एवं पर्यावरण विशेषज्ञ ने इस बात को लेकर आगाह किया है। इनका कहना है कि पराली जलाने से पैदा हुआ धुआं लोगों के श्वसन तंत्र को नुकसान पहुंचाएगा तो कोरोना वायरस का असर और घातक हो जाएगा।


पराली क्या होती है?

पराली धान की फसल कटने के बाद बचा बाकी हिस्सा होता है, जिसकी जड़ें ज़मीन में होती हैं। किसान धान पकने के बाद फसल का ऊपरी हिस्सा काट लेते हैं क्योंकि वही काम का होता है बाकी किसान के लिये बेकार होता है। 

उन्हें अगली फसल बोने के लिये खेत खाली करने होते हैं तो सूखी पराली को आग के हवाले कर दिया जाता है। 

आजकल पराली इसलिये भी अधिक होती है क्योंकि किसान अपना समय बचाने के लिये मशीनों से धान की कटाई करवाते हैं।

 मशीनें धान का केवल ऊपरी हिस्सा काटती हैं और नीचे का हिस्सा अब पहले से ज़्यादा बचता है। 
इसे हरियाणा तथा पंजाब में पराली कहा जाता है। 

यदि किसान हाथों से धान की कटाई करें तो खेतों में पराली नहीं के बराबर बचती है। 

बाद में किसान इस पराली को पशुओं के चारे के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं। 

एक्सपर्ट की चेतावनी
फसल अवशेषों के प्रबंधन को लेकर केंद्र एवं पंजाब सरकार के सलाहकार संजीव नागपाल ने रविवार को कहा, 'यदि पराली जलाने के वैकल्पिक प्रबंध नहीं किए गए तो प्रदूषणकारी तत्व, कार्बन मोनोऑक्साइड और मीथेन जैसी जहरीले गैसों के कारण श्वसन संबंधी गंभीर समस्याओं में बढ़ोतरी हो सकती है, जिसके चलते कोविड-19 के हालात और बिगड़ जाएंगे क्योंकि कोरोना वायरस श्वसन प्रणाली को प्रभावित करता है।'


पंजाब-हरियाणा में पराली जलाने की बड़ी समस्या
उन्होंने कहा, 'पिछले साल पंजाब में पराली जलाने के करीब 50 हजार मामले सामने आए थे। उत्तर के मैदानी इलाकों के वातावरण में सूक्ष्म कणों की मात्रा में 18 से 40 फीसदी योगदान पराली जलाने का रहता है। पराली जलने के कारण मीथेन, कार्बन मोनोऑक्साइड जैसी जहरीली प्रदूषणकारी गैसें भारी मात्रा में उत्पन्न होती हैं।' पिछले साल दिल्ली-एनसीआर के 44 फीसदी प्रदूषण की वजह पंजाब और हरियाणा में पराली जलाना रहा।
निष्कर्ष

किसानों के पराली जलाने के मुख्य कारणों में कटाई के लिए मजदूरों का ज्यादा पैसे की मांग और अधिक समय लगना भी है। यहाँ समझने की जरूरत है कि पराली (stubble) बहुपयोगी स्रोत भी हो सकता है। अप्रैल में गेहूँ की फसल काटने के बाद धान उगाने के बीच लगभग तीन माह का समय होता है। इस बीच गेहूँ के अवशेष को आसानी से पर्यावरण हितैषी तरीके से निस्तारित किया जा सकता है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा में कुछ किसानों ने न सिर्फ पराली को खेतों में दबाकर बनी खाद से अच्छी फसल ली बल्कि कुछ ने तो खाद को बेचकर नकदी भी अर्जित की। अब सवाल यह है कि पराली निस्तारण को लेकर ऐसी आम जानकारियाँ भी लोगों तक पहुँची नहीं हैं, तो इसके पीछे क्या कारण है। डिजिटल इंडिया के इस दौर में भी बहुत से किसान पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन और कम्पोस्ट खाद जैसे नामों से अनजान हैं। सरकार ने जिन एजेंसियों को ऐसे मामलों में जागरूकता की जिम्मेदारी सौंपी है, वे गाँवों में जाते तक नहीं हैं। ऐसे में पराली अब एक विकराल समस्या बन कर खड़ी हो गई हैं।

हर इंसान को कार्य करता है को उसका जीवन सरल बनते है , और आसान होते है , उस है तरह हमारे देश के किसान भी मजबूरन खेत में बची पराली को जलते है ।
जैसा कि हम सब समझ चुके है कि पराली का जलना हमारे लिए कितना नुकसानदायक है , सरकार चाहे तो नए किसान बिल में पुनः विचार करके उसमे पराली कि समस्या का भी उपाय रख सकती है , 
या तो बची पराली को खाद में तेह समय में बदल दिया जाए , या भेच कर किसानों को ही आर्थिक मदद की जाए ।

या तो मके इन इंडिया के तहत सब्सिडरी देते हुए ऐसी मशीनरी का निर्माण किया जाए जी फसल को ना केवल ऊपर से काटे बल्कि नीचे तक से कर कर खेत को साफ करे ।
जिस से देशवासियों और किसान दोनों का हित्त हो ।
जिस से देश में नए रोजगार भी पैदा होंगे लोगो में प्रोत्साहन आयेगा , व देश और गति से विकास सकेगा ।


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