मंगलवार, 7 जुलाई 2020

महिलाओ पर बढ़ता अमानवीय अपराध ।

यू तो हमारे समाज में रेप पर कई कानून व प्रावधान है । लेकिन क्या वह सब उस लड़की के दर्द के सामने काफी है ,
समाज में जो इज्जत उस लड़की की नहीं रहेगी क्या कोई कानून उसकी वह इज्जत वापिस दिला सकता है ?
जब एक लड़की के साथ ऐसा अमानवीय अपराध होता है , तब वह उस लड़की के लिए उसकी मृत्यु से भी ज्यादा भयानक होता है ।
समाज में लड़की की इज्जत तब से ही खतम हो जाती है , जब समाज के कुछ लोग उसको गलत निगाह से देखने लग जाते हैं । 
समाज में ना जाने क्यों यह अधिकार लोगो को मिल जाता है कि जब एक लड़की देर रात बाहर निकले तो वह उसके चरित्र पर सवाल उठाए , 
जब एक लड़की छोटे कपड़े पहने तो ये लोग उसकी चाल पर सवाल उठाए । 
किसी के चरित्र पर सवाल उठाने का हक़ इन लोगो को कौन देता है ? 
लेकिन यह लोग उन लड़कों पर सवाल कभी नहीं उठाते की किसने हक़ दिया उन्हें , देर रात अकेली लड़की की इज्जत पर हाथ डालने का ।
लड़की से तो यह सवाल कर दिए जाते है कि क्यों तुमने छोटे कपडे पहने थे लेकिन , लड़कों से कोई यह नहीं पूछता की क्यों और किस हक़ से तुमने लड़की की इज्ज़त पर हाथ डाला ।
और ऐसे कई सवाल शुरू से अंत तक लड़की से की किए जाते है , 
रेप जैसी अमानवीय अपराध हो जाने के बाद भी यह लोग 
सवाल उस लड़की से ही करते है कि , क्या ज़रूरत थी देर रात बाहर निकालने की ! 
लेकिन कभी लड़कों से यह नहीं कहा जाता की देर रात में तुम बाहर मत निकलो हमेशा लड़कियों को ही दबाया जाता है ।
और इन सब के बावजूद समाज में इज्जत लड़की की ही खराब मनी जाती है , उस बदचलन , चरित्रहीन , समझ लिया जाता है ।
ज़िन्दगी एक दो पहिया साईकिल जैसी है , 
जिसका एक पहिया ज़िन्दगी है और दूसरा इज्ज़त ,
और पैसा उन पैडलो जैसा ।
समाज में जीने के लिए पैसे से कहीं ज़्यादा ज़रूरी इज्ज़त होती है ।
ना तो पहिए के बगैर साईकिल चाल सकती है  ,
और ना ही पैडल के बगैर ।
हमारे समझ को सख्त कानून के साथ - साथ एक बेहतर विचार वालो समाज की भी सख्त ज़रूरत है ।
हमे अपने घर में अपने बेटो - भाईयो को यह सीख बचपन से  ही देनी होगी , के दूसरे घर की लड़कियों कि इज्ज़त कैसे करनी चाहिए ।
घर के बाद विद्यालयों में भी सिर्फ किताबी दुनिया के अलावा , समाज की भी विद्या देनी होगी ।
उनको यह समझना होगा कि समाज में एक जिम्मेदार नागरिक बनकर किस तरह से रहना चाहिए ,
और फिर ज़रूरत होगी कानूनी नियमों  का सख्ती से पालन करवाने की , व उन्हें और सख्त बनाने की ,
कानून को इतना सख्त करना पड़ेगा की एक व्यक्ति अपराध करने से पहले उससे होने वाले परिणाम के बारे में सोचे ।
वह किसी महिला पर घिनौनी निगाह डालने से पहले उसके अंजाम के बारे में सोचे  ,
निश्चित तौर पर आज कल के दौर में महिलाओ पर बढ़ते अपराध पर नियंत्रण रखने के लिए यह सब आवश्यक है ।

सोमवार, 6 जुलाई 2020

क्या आज सही में लड़कियां आज़ाद है ?

क्या इस ज़माने में महिलाएं सही में आज़ाद है?
कहा जाता है के आज के इस आधुनिक दौर में लड़कियां लड़कों से कंधे से कंधे मिला कर चलने में सक्षम है ।
पर क्या सही में ऐसा ही है ?
क्या अब हमारे देश में लड़कियां खुद इतनी सक्षम हैं के उन्हें लड़कों के साथ नापा जा सके ।
इसका जवाब हम सब बेहतर जानते है और समझते भी है ।
क्योंकि आज भी जब एक लड़की अकेले अंधेरी रात में बाहर जाने का सोचती है , मगर उस डर लगता है।
जब दिन के उजाले में भारी - भीड़ में एक औरत को जाना होता है तब उसे डर लगता है।
उस लड़की को डर लगता है उन दरिंदो से जो अंधेरी रात में उस अकेली लड़की का ग़लत फायदा उठाकर उसके साथ अमानवीय काम करते है, 
उस औरत को डर लगता है उस भीड़ में उन दरिंदो से जो भीड़ की आड़ में उस औरत को गलत तरीक़े से हाथ लगाते है ।
यह कैसी आज़ादी है ?
जहा हम अपनी बेटी को तो आज़ादी देते है ,
लेकिन जब दूसरे घर की बेटी को बहू बनकर लेट है , तब उसे चार दिवारी में बंद करके रखते है । 
जहा बेटी को तो अपने मन्न की आज़ादी होती है
लेकिन बहू को पांच मिनट ज़्यादा आराम करने की आज़ादी नहीं ।
जहा बेटी को तो आज़ादी है कि वह अपनी आज़ादी से किसी भी तरह के वस्त्र पहने , लेकिन बहू के सर से पल्लू नहीं सरकना चाहिए ?
यह कैसी आज़ादी है ?


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