सोमवार, 28 सितंबर 2020

मशहूर संगीतकार श्री लता मंगेशकर

लता मंगेशकर
भारत रत्न लता मंगेशकर भारत की सबसे लोकप्रिय और आदरणीय गायिका हैं जिनका छ: दशकों का कार्यकाल उपलब्धियों से भरा पड़ा है। जिनकी आवाज़ ने छह दशकों से भी ज़्यादा संगीत की दुनिया को सुरों से नवाज़ा है। भारत की 'स्‍वर कोकिला' लता मंगेशकर ने 20 भाषाओं में 30,000 गाने गाये है। उनकी आवाज़ सुनकर कभी किसी की आँखों में आँसू आए, तो कभी सीमा पर खड़े जवानों को सहारा मिला। लता जी आज भी अकेली हैं, उन्होंने स्वयं को पूर्णत: संगीत को समर्पित कर रखा है।लेकिन उनकी पहचान भारतीय सिनेमा में एक पार्श्वगायक के रूप में रही है। अपनी बहन आशा भोंसले के साथ लता जी का फ़िल्मी गायन में सबसे बड़ा योगदान रहा है।
लता दीनानाथ मंगेशकर का जन्म 28 सितम्बर, 1929 इंदौर, मध्यप्रदेश में हुआ था।उनके पिता दीनानाथ मंगेशकर एक कुशल रंगमंचीय गायक थे। दीनानाथ जी ने लता को तब से संगीत सिखाना शुरू किया, जब वे पाँच साल की थी। उनके साथ उनकी बहनें आशा, ऊषा और मीना भी सीखा करतीं थीं। लता 'अमान अली ख़ान साहिब' और बाद में 'अमानत ख़ान' के साथ भी पढ़ीं। लता मंगेशकर हमेशा से ही ईश्वर के द्वारा दी गई सुरीली आवाज़, जानदार अभिव्यक्ति व बात को बहुत जल्द समझ लेने वाली अविश्वसनीय क्षमता का उदाहरण रहीं हैं। इन्हीं विशेषताओं के कारण उनकी इस प्रतिभा को बहुत जल्द ही पहचान मिल गई थी। लेकिन पाँच वर्ष की छोटी आयु में ही आपको पहली बार एक नाटक में अभिनय करने का अवसर मिला। शुरुआत अवश्य अभिनय से हुई किंतु आपकी दिलचस्पी तो संगीत में ही थी।
 
वर्ष 1942 में इनके पिता की मौत हो गई। इस दौरान ये केवल 13 वर्ष की थीं। नवयुग चित्रपट फिल्‍म कंपनी के मालिक और इनके पिता के दोस्‍त मास्‍टर विनायक (विनायक दामोदर कर्नाटकी) ने इनके परिवार को संभाला और लता मंगेशकर को एक सिंगर और अभिनेत्री बनाने में मदद की।
सफलता की राह कभी भी आसान नहीं होती है। लता जी को भी अपना स्थान बनाने में बहुत कठिनाइयों का सामना करना पडा़। कई संगीतकारों ने तो आपको शुरू-शुरू में पतली आवाज़ के कारण काम देने से साफ़ मना कर दिया था। उस समय की प्रसिद्ध पार्श्व गायिका नूरजहाँ के साथ लता जी की तुलना की जाती थी। लेकिन धीरे-धीरे अपनी लगन और प्रतिभा के बल पर आपको काम मिलने लगा। लता जी की अद्भुत कामयाबी ने लता जी को फ़िल्मी जगत की सबसे मज़बूत महिला बना दिया था।
 
लता जी को सर्वाधिक गीत रिकार्ड करने का भी गौरव प्राप्त है। फ़िल्मी गीतों के अतिरिक्त आपने ग़ैरफ़िल्मी गीत भी बहुत खूबी के साथ गाए हैं। लता जी की प्रतिभा को पहचान मिली सन् 1947 में, जब फ़िल्म “आपकी सेवा में” उन्हें एक गीत गाने का मौक़ा मिला। इस गीत के बाद तो आपको फ़िल्म जगत में एक पहचान मिल गयी और एक के बाद एक कई गीत गाने का मौक़ा मिला। इन में से कुछ प्रसिद्ध गीतों का उल्लेख करना यहाँ अप्रासंगिक न होगा। जिसे आपका पहला शाहकार गीत कहा जाता है वह 1949 में गाया गया “आएगा आने वाला”, जिस के बाद आपके प्रशंसकों की संख्या दिनोदिन बढ़ने लगी। इस बीच आपने उस समय के सभी प्रसिद्ध संगीतकारों के साथ काम किया। अनिल बिस्वास, सलिल चौधरी, शंकर जयकिशन, एस. डी. बर्मन, आर. डी. बर्मन, नौशाद, मदनमोहन, सी. रामचंद्र इत्यादि सभी संगीतकारों ने आपकी प्रतिभा का लोहा माना। लता जी ने दो आँखें बारह हाथ, दो बीघा ज़मीन, मदर इंडिया, मुग़ल ए आज़म, आदि महान फ़िल्मों में गाने गाये है। आपने “महल”, “बरसात”, “एक थी लड़की”, “बडी़ बहन” आदि फ़िल्मों में अपनी आवाज़ के जादू से इन फ़िल्मों की लोकप्रियता में चार चाँद लगाए। इस दौरान आपके कुछ प्रसिद्ध गीत थे: “ओ सजना बरखा बहार आई” (परख-1960), “आजा रे परदेसी” (मधुमती-1958), “इतना ना मुझसे तू प्यार बढा़” (छाया- 1961), “अल्ला तेरो नाम”, (हम दोनो-1961), “एहसान तेरा होगा मुझ पर”, (जंगली-1961), “ये समां” (जब जब फूल खिले-1965) इत्यादि।

शनिवार, 19 सितंबर 2020

INDIAN PREMIER LEAGUE

आईपीएल क्या है (Indian Premier League)


आईपीएल (इंडियन प्रीमियर लीग) एक टी 20 लीग है, जो की हर वर्ष हमारे देश में होता है और इस लीग में भारत सहित अन्य देशों के प्लेयर्स भी भाग लेते हैं. क्रिकेट के इस लीग में हिस्सा लेने वाली टीमें भारतीय शहरों या राज्यों को रिप्रेजेंट करती हैं. इन टीमों के बीच मैच खेले जाते हैं और अंत में जो टीम विजय रहती है उस इनाम दिया जाता है.


बीसीसीआई (बोर्ड ऑफ कंट्रोल फॉर क्रिकेट इन इंइिया) ने इंडियन प्रीमियर लीग को स्टार्ट करने की घोषणा साल 2007 में की थी और इस घोषणा के एक साल बाद ही इस लीग को शुरू कर दिया गया था.


बीसीसीआई (बोर्ड ऑफ कंट्रोल फॉर क्रिकेट इन इंइिया) ने इंडियन प्रीमियर लीग को स्टार्ट करने की घोषणा साल 2007 में की थी और इस घोषणा के एक साल बाद 2008  में ही इस लीग को शुरू कर दिया गया था.


इस लीग की घोषणा करने के कुछ महीनों बाद इस लीग की टीमों की फ्रेंचाइजी को बेचा गया था. टीम की फ्रेंचाइजी लेने के लिए लगी ऑक्शन में जिनके द्वारा अधिक बोली लगाई गई थी, उन लोगों को टीमों की फ्रेंचाइजी मिल गई थी. इस तरह से बैंगलोर, चेन्नई, दिल्ली, हैदराबाद, जयपुर, कोलकाता, मोहाली और मुंबई टीमों को उनके मालिक मिले थे.


वैसे आईपीएल हर साल मई जून में होता है, लेकिन इस बार कोरोना की वजह से इसकी डेट आगे बढाई गई. इस साल मैच भारत में न होकर यूएई के तीन शहरों में हो रहा है. जिसमें 8 टीम हिस्सा ले रही है. हर बार आईपीएल का फाइनल मैच वीकेंड मतलब शनिवार या रविवार को होता था, इस बार ऐसा नहीं है. 53 दिन के इस टूर्नामेंट में 56 मैच होने है. 10 ऐसे दिन निश्चित है जिसमें दिन में 2 मैच होंगें. एक टीम में 24 सदस्य का चुनाव किया गया है, ताकि किसी भी परिस्थिति में मैच हो सके. कोरोना के कारन कितने बार भी टीम में प्लेयर को बदला जा सकेगा.



साल 2013 के लीग के दौरान मैच फिक्सिंग की गई थी जिसके कारण दो टीमों पर प्रतिबंध लगा दिया गया था और ये टीम चेन्नई सुपर किंग्स और राजस्थान रॉयल्स थी. इन टीमों के अलावा कई प्लेयर्स पर भी इस लीग में भाग लेने पर बैन लगाया गया था. हालांकि की बैन लगी टीमों ने साल 2018 के लीग में फिर से वापसी कर ली है.

साल 2013 में आईपीएल की फ्रेंचाइजी टीम पुणे वॉरियर्स इंडिया (पीडब्ल्यूआई) के मालिकों ने अपनी ये फ्रेंचाइजी छोड़ दी थी. क्योंकि इस टीम के मालिकों द्वारा फ्रेंचाइजी लेने का शुल्क भुगतान नहीं किया गया था.

आईपीएल को शुरू करने के पीछे सबसे बड़ा हाथ ललित मोदी का ही था और ये आईपीएल के अध्यक्ष हुआ करते थे. लेकिन सट्टेबाजी और मनी लॉंडरिंग में शामिल होने के कारण मोदी को आईपीएल से निकाल दिया गया था और इस वक्त ये दूसरे देश में रह रहे हैं.


आईपीएल का जुनून केवल भारत तक सीमित नहीं है और इस लीग को अन्य देशों में भी देखा जाता है. एशिया, मध्य पूर्व, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, और अमेरिका में आईपीएल की व्यूवरशिप काफी का अधिक है.


आईपीएल की वजह से हमारे देश को कई फायदे भी हो रहे हैं, जैसे कि इसकी वजह से हमारे देश की इकॉनमी बढ़ रही है और अन्य देश से लोग इन खेलों को देखने के लिए भारत आ रहे हैं, जिससे की हमारे देश के टूरिज्म को भी बढ़ावा मिल रहा है.

हालांकि 2020 में कोरोना काल में ऐसा संभव नहीं हो पाएगा ।


इस लीग में इस वक्त कुल आठ टीमें हिस्सा ले रही हैं और इन आठ टीमों को हमारे देश के कारोबारी और अभिनेताओँ द्वारा खरीदा गया है.


  • अर्श वर्मा


शुक्रवार, 18 सितंबर 2020

खराब होती पुलिस कि छवि !

पुलिस की बिगड़ती छवि !



फिल्मों में पुलिस बल को जिस तरह से दिखाया जाता है, उस वजह से फिल्मों ने आम आदमी के जहन में पुलिस की बहुत खराब छवि बना दी है।


फिल्मी जगत ने आम आदमी के दिमाग में पुलिस की एक बहुत बुरी छवि बना दी है और मैं उनसे पूछना चाहता हूं कि ऐसा क्यों? हां, कुछ कमियां हो सकती है, लेकिन उन्हें बढ़ा-चढ़ाकर पेश नहीं किया जाना चाहिए। अच्छी और सकारात्मक चीजों को सामने लाकर इन कमियों को दूर करना क्या हमारा दायित्व नहीं है।


आम आदमी पर फिल्मों का बहुत असर पड़ता है और उनके सहयोग के बिना पुलिसिंग सफल नहीं हो सकती।, हमें आम आदमी की नजर और नजरिये को बदलना चाहिए।


हमारे देश के मीडिया को भी यह बात भलीभांति समझनी होगी की  वह ज्यादातर नकारात्मक खबरों पर जोर ना दे। व उसकी जगह  हजारों अच्छी खबरें भी होती हैं, जो मीडिया में दिखाई जनी चाहिए ।


 हर व्यक्ति के जीवन में कभी न कभी ऐसा मौका जरूर आया होगा, जब पुलिस ने उसकी मदद की होगी और इन बातों को पुलिस बल की छवि बेहतर बनाने के लिए ज्यादा से ज्यादा प्रचारित किया जाना चाहिए। व प्रत्येक थाना हर सप्ताह एक सकारात्मक स्टोरी को ऑनलाइन करे, तब लोगों को पता चलेगा कि पुलिस ने कितने अच्छे काम किए हैं।


जैसे की आम जनता यह मानती है की पुलिस सबसे ज्यादा भ्रष्ट विभाग है जो की सही नहीं है पुलिस से भी ज्यादा भ्रष्ट अन्य सरकारी महकमा है लेकिन आम जनता में पुलिस की प्रति ऐसा छवि है की पुलिस ही सबसे बड़ी भ्रष्ट विभाग है ! जोकि एक सही बात नहीं ।


पुलिस की सकारात्मक छवि होने से पुलिस कर्मचारियो का मनोबल उच्चा रहता है तथा विकाश का मार्ग प्रसस्त करने में उपयोगी भुमिका निभाती है तथा समाज के अन्दर कानून के राज्य स्थापित करने में आसानी होता है ! 

पुलिस के सकारात्मक छवि होने पे हर पुलिस कर्मी सोचता है की जनता हमारे साथ है और जरुरत पड़ने पे हमें पोलिसिंग करने में मदद करेगी ! इस लिए पुलिस को अपनी सकारात्मक छवि हमेशा बनाये रखना चाहिए ।


अगर पुलिस सकारात्मक छवि नहीं रखती है तो निम्नलिखित उद्देश्यों को पूरा करने में काफी कठिन हो सकता है !


  • विभागीय उद्देश्य की पूर्ति करना जिसमे अपराधो की रोकथाम करना और कानून व्यवस्था को कायम करना !


  • मानव मूल्यों को कायम रखते हुए सामाजिक न्याय प्रदान करना !


  • जनापेक्षाओ की पूर्ति करना !


  • जनता की सहायता व सहयोग प्राप्त करना !


  • नैतिक मूल्यों की रक्षा करना व पुलिस मनोबल को बढ़ाना !


  • प्रभावी ढंग से कर्तव्य पालन हेतु कार्यक्षमता को बढ़ाना !


  • आमलोगों से मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध कायम रखना !


  • सभी के अधिकारों की रक्षा करना व न्याय दिलाना !


जैसा कि हम सब ने देखा कि जमिया हिंसा में पुलिस की छवि पर एक बड़ा सवाल खड़ा हुआ था ।

तमाम ऐसी तस्वीरें सामने अयी थी जहा दिखाई दे रहा था कि पुलिस बोहोत अमानवीय कार्य कर रही थी , इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता के पुलिस कई जगह बर्बरता करती है , लकिन इस बात को इस तरह से कहना की पुलिस ही गलत है तो यह सही नहीं होगा ।

पुलिस की डोर सरकार के हाथ में होती है , और हमे यह बात अच्छे से समझनी होगी , सरकार के आदेश से अलग कार्य कोई पुलिसकर्मी  नहीं कर सकता ।


लेकिन कई बार ऐसा भी होता है कि पुलिस की सिर्फ गलत छवि को पेश किया जाता है । 

जहा ऐसा आभास होता है कि पुलिस मासूमों पर अत्याचार कर रही है , जोकि सिक्के का एक ही पहलू होता है , कई बार तस्वीरो में दिख रही पुलिस अपराधी को मार रही होती है , लेकिन तस्वीर को गलत तरह से पेश किया जाता है और कहा जाता है कि पुलिस निर्दोष को मार रही है ।

हमारे समाज को यह समझना होगा कि पुलिस हमारी भलाई के लिए है , हमारी बुराई के लिए नहीं ।


कई बार तस्वीरें ऐसी सामने आती है जिसमें पुलिसकर्मी  गर्मी से बेहाल है फिर भी वह पूरी निष्ठा से अपना कर्तव्य अपनी ड्यूटी को कर रहा है , 

रात में बिना हवा के मच्छरों के साथ खुले आसमान के नीचे वह खड़ा होकर पूरी रात गुजर रहा है क्युकी उसकी नौकरी वह है ।

महीनों अपने घरवालों से दूर रहने व अपने बच्चो से दूर रहने का दर्द एक फौजी और एक पुलिसकर्मी ही समझ सकता है ।

दो - दो दिन बिना सोए बिताना कैसा होता है यह एक फौजी व पुलिसकर्मी ही समझ सकता है ।


पुलिसकर्मी कभी अपनी ड्यूटी खत्म नहीं करता है , मतलब बड़े साहब का आदेश जिस वक्त भी आ जाए चाहे आधी रात हो या दिन  उसको उस समय जाना होता है ।



 फिल्मी दुनिया के कलाकारों व निर्माताओं को इस बात का ख्याल रखना होगा कि पुलिस की छवि हमेशा गलत पेश करना हमारे समाज के लिए लाभदाई नहीं होगा ,

सिर्फ विभाग में चांद भ्रष्ट पुलिसकर्मियों को वजह से पूरे पुलिस प्रशासन को बुरा कहना व कटघरे में खड़ा करना सही नहीं । 

हमे व हमारे समाज को यह समझना चाहिए कि पुलिस बुरी नहीं , फिल्मों में दिखाई जाने वाली पुलिस की छवि सही नहीं व मीडिया में पुलिस के बुरे कर्यो को ही दर्शाना सही नहीं ।

पुलिस का एक छोटा हिस्सा दूषित है और उसके कारण हमे पूरे प्रशासन को दूषित कहना सही नहीं ।




सोमवार, 14 सितंबर 2020

हिंदी दिवस

 


हिंदी दिवस 2020:


 जैसे की हम सभी जानते ही हैं की हिंदी दिवस हर साल 14 सितम्बर को मनाया जाता है | आजकल ज्यादातर लोग हिंदी को छोड़कर अंग्रेजी भाषा को ज्यादा महत्व देने लगे हैं | लेकिन हमे इस बात का ध्यान रखना चाहिए की हिंदी हमारी मातृभाषा है और हमे इसे महत्व देना चाहिए |

भारत के संविधान ने देवनागरी लिपि में लिखित हिंदी को 1950 के अनुच्छेद 343 के तहत देश की आधिकारिक भाषा के रूप में 1950 में अपनाया। इसके साथ ही भारत सरकार के स्तर पर अंग्रेजी और हिंदी दोनों भाषाएं औपचारिक रूप से इस्तेमाल हुईं। 1949 में भारत की संविधान सभा ने देश की आधिकारिक भाषा के रूप में हिंदी को अपनाया। वर्ष 1949 से प्रत्येक वर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है।
यह दिन हर साल हमें हमारी असली पहचान की
याद दिलाता है और देश के लोगों को एकजुट
करता है। जहां भी हम जाएँ हमारी भाषा, संस्कृति
और मूल्य हमारे साथ बरक़रार रहने चाहिए और
ये एक अनुस्मारक के रूप में कार्य करते है। हिंदी दिवस एक ऐसा दिन है जो हमें देशभक्ति भावना
के लिए प्रेरित करता है।जहाँ अंग्रेजी एक विश्वव्यापी भाषा है और इसके महत्व को अनदेखा नहीं किया जा सकता है वहीँ हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हम पहले भारतीय हैं और हमें हमारी राष्ट्रीय भाषा का सम्मान करना चाहिए। आधिकारिक भाषा के रूप में हिंदी को अपनाने से साबित होता है कि सत्ता में रहने वाले लोग अपनी जड़ों को पहचानते हैं और चाहते हैं कि लोगों द्वारा हिंदी को भी महत्व दिया जाए।
निस्संदेह भारत में हिंदी सबसे व्यापक रूप से इस्तेमाल की जाने वाला भाषा है। हालांकि अंग्रेजी के प्रति अभी भी भारतवासियों का झुकाव है और इसके महत्व पर स्कूलों और अन्य स्थानों पर जोर दिया जाता है परन्तु हिंदी हमारे देश की सबसे व्यापक रूप से बोली जाने वाली भाषा के रूप में मजबूत है। 2011 में आयोजित जनगणना में 422 लाख से अधिक लोगों ने अपनी मातृभाषा के रूप में हिंदी का उल्लेख किया। देश में किसी भी अन्य भाषा का कुल आबादी का 10% से अधिक उपयोग नहीं किया जाता है। हिंदी बोलने वाली अधिकांश आबादी उत्तर भारत में केंद्रित है।
जहाँ अंग्रेजी एक विश्वव्यापी भाषा है और इसके महत्व को अनदेखा नहीं किया जा सकता है वहीँ हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हम पहले भारतीय हैं और हमें हमारी राष्ट्रीय भाषा का सम्मान करना चाहिए। आधिकारिक भाषा के रूप में हिंदी को अपनाने से साबित होता है कि सत्ता में रहने वाले लोग अपनी जड़ों को पहचानते हैं और चाहते हैं कि लोगों द्वारा हिंदी को भी महत्व दिया जाए।


लेखक - अर्श वर्मा 


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